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ಇತಿಹಾಸ

पानीपत के तीसरे युद्ध में अगर् इन लोगों ने मराठों का साथ देते तोआज देश में इस्लाम कट्टरवाद नही रहता था।

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14 जनवरी, 1761, मकर संक्रत के दिन पानीपत का तीसरा युद्ध, मराठों का शौर्य का इतिहास

मराठा जिते तो इतिहास बनता ही है ।
मराठा हारने के बाद भी इतिहास बनता है ।

‘पानीपत का तीसरा युद्ध,विश्व के इतिहास का ऐसा संग्राम था, जिसने पूरे विश्व के राजनीतिक पटल को बदलकर रख दिया। पानीपत संग्राम हमारे राष्ट्रीय जीवन की जीत है, जो हमारी अखण्डता के साथ चलती आई है।’

विदेशी आक्रमणकारी

अफगान, तुर्क आदि देशों से आए आक्रमणकारियों ने सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत पर शासन करने के लिए कई बार आक्रमण किए, जिनमें लाखों लोगों की जानें गई,अहमद शाह अब्दाली भी एक विदेशी आक्रमणकारी था,मराठा अपने देश को अब्दाली के चंगुल से आजाद करना चाहते थे ।

पानीपत की तीसरी लड़ाई

पानीपत की तीसरी और आखिरी लड़ाई बहुत भयंकर थी। इसमें ना जाने कितने ही योद्धा मारे गए थे, कितने ही सैनिक शहीद हुए और कितने ही घरों के चिराग बुझ गए। यह लड़ाई वर्तमान दिल्ली से करीब 90 किलोमीटर दूरी पर लड़ी गई थी।

निर्णायक युद्ध

14 जनवरी, 1761 को हुए इस युद्ध को अठारहवीं शताब्दी में मराठों और अफगानों के बीच चल रहे युद्धों की कड़ी का निर्णायक युद्ध कहा जाता है। इसके अलावा भारत के सैन्य इतिहास में भी इस युद्ध को एक क्रांतिकारी घटना माना जाता है।

सेनापति की हत्या

10 जनवरी, 1760 को अहमद शाह अब्दाली ने मराठा सेनापति दत्ताजी की अमानविए हत्या कर दिल्ली को अपने कब्जे में ले लिया था। इस खबर को सुनकर तत्कालीन पेशवा बालाजीराव ने अब्दाली से लोहा लेने के लिए अपने चचेरे भाई सदाशिव भाऊ के नेतृत्व में सेना भेजी। इस सेना ने पहले युद्ध में तो दिल्ली को अब्दाली के चंगुल से आजाद करवा लिया लेकिन यह जीत उनके लिए एक जश्न का मौका नहीं बन पाई।

भूख का सिलसिला

पानीपत की लड़ाई मराठा वीर विपरित परिस्थितियों के कारण हारे। उस दौरान दिल्ली और पानीपत के भीषण अकालों ने मराठा वीरों को तोड़कर कर रख दिया था| और भरतपुर के शासक सूरजमल ने मराठों का साथ छोड़ दिया। इतना ही नहीं अवध का तत्कालीन नवाब शुजा-उद-दौला भी अब्दाली के साथ जा मिला। दिल्ली को जीतने के कई माह बाद तक मराठे वहां से निकल नहीं पा रहे थे, जिसकी वजह से वहां खाद्य सामग्री और धन का अभाव होने लगा

अब्दाली का कब्जा

दिल्ली से बाहर निकल उन्होंने कुंजपुरा की चौकी को भी अपने कब्जे में ले लिया, जिससे अब्दाली बौखला गया। अब्दाली ने दोबारा कुंजपुरा पर हमला किया और उसे अपने कब्जे में ले लिया।

युद्ध का आगाज

उस समय पानीपत और आसपास के इलाकों में भयंकर अकाल पड़ा था। जिसका असर मराठों पर पड़ रहा था। बदतर हालातों की वजह उन्होंने सर्वप्रथम अब्दाली से बात करने की कोशिश की लेकिन उनका यह प्रयास असफल रहा। नतीजतन उन्हें अंत में युद्ध करना ही पड़ा।

कीमत

यह युद्ध अहमद शाह ने जीत लिया था लेकिन दोनों ही पक्षों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। आंकड़ों के अनुसार इस लड़ाई में 30 हजार से अधिक मराठा
मारे गए थे और इतने ही इस युद्ध के बाद अफगान सिपाहियों के क्रोध की भेंट चढ़ गए। और 20 हजार से अधिक मराठा बंदी बनाए गऐ।

मराठों का मजबूत आत्मविश्वास

ऐसा कहा जाता है कि मराठा अपनी सैन्य शक्ति में काफी मजबूत थे। अपनी इस ताकत पर वे बेहद घमंड भी करते थे, जिसके चलते जाट और राजपूत उनसे दूरियां बनाते गए। यही वजह थी कि जब अफगान से आए आक्रांता अहमद शाह अब्दाली ने मराठों पर आक्रमण किया तो कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ। मराठा मजबूत आत्मविश्वास के साथ अहमद शाह अब्दाली से लढा.

सिखों का अश्वासन

दूसरी ओर अहमद शाह अब्दाली ने सिख और कई हिन्दू शासकों से यह आश्वासन ले लिया था कि वे पानीपत की तीसरी लड़ाई में किसी भी ओर से भाग नहीं लेंगे। पानीपत की तीसरी और सबसे ज्यादा घातक लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली को अन्य दो भारतीय राजाओं, रोहिल्ला अफगान दोआब और अवध के नवाब शुजा-उद-द्दौला का सहयोग प्राप्त था।

मराठा पराजय के कारण

पानीपत के इस युद्ध में मराठों की पराजय के महत्त्वपूर्ण कारण इस प्रकार थे-
युद्ध में  राजपूत, जाट तथा सिक्खों ने मराठों का साथ नहीं दिया।
पानीपत की लड़ाई मराठा वीर विपरित परिस्थितियों के कारण हारे। उस दौरान दिल्ली और पानीपत के भीषण अकालों ने मराठा वीरों को तोड़कर कर रख दिया था

अहमदशाह अब्दाली की सेना, सदाशिवराव भाऊ की सेना से अधिक थी।

उत्तर भारत की सभी मुसलमान शक्तियाँ अब्दाली के साथ था
मराठा सरदारों के आपसी मतभेद भी काफ़ी हद तक बढ़ चुके थे।

मराठों के सैनिक शिविर में अकाल की स्थिति थी। सैनिकों के लिए पर्याप्त रसद का इंतजाम नहीं था।

सैनिक संगठन की दृष्टि से अब्दाली पूरी तरह से श्रेष्ठ संगठनकर्ता था।

इतिहासकारों के मत

पानीपत के तृतीय युद्ध के प्रभाव के बारे में जहाँ एक तरफ़ मराठा इतिहासकारों का मानना है कि, केवल 75,000 सैनिकों की हानि के अतिरिक्त मराठों ने कुछ भी नहीं खोया, वहीं दूसरी ओर ‘जी.एस. सरदेसाई’ का मानना है कि, ‘पानीपत का युद्ध मराठों की अभूतपूर्ण क्षति है।’ पानीपत के तृतीय युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी ‘काशीराज पंडित’ के शब्दों में- ‘पानीपत का तृतीय युद्ध मराठों के लिए प्रलयकारी सिद्ध हुआ।

– अमोल.द.माने

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